फलों एवं सब्जियों का उत्पादन, किसानों के लिए एक जैविक महत्व रखता है क्योंकि यह प्रति हेक्टेयर जमीन में पैदा होने वाले अनाज की तुलना में तीन से चार गुना ज्यादा नकद आमदनी का स्रोत है। आमदनी के इस स्रोत के अलावा पूरे विश्व में यह संतुलित आहार एवं पौष्टिक गुण प्रदान करने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा करता है। संपूर्ण विश्व में फलों के उत्पादन में केले का सबसे महत्वपूर्ण स्थान है। धान, गेहूँ एवं दूध उत्पादन के बाद सकल मूल्य के सन्दर्भ में यह चौथी मुख्य फसल है। इसका उद्गम स्थल मलेशिया है। इस फल का सबसे बड़ा फायदा यह है कि इसकी उपलब्धता पूरे साल रहती है। चीनी, अनाज व कॉफी के बाद विश्व व्यपार में केला पाँचवा सबसे बड़ा कृषि उत्पाद है। इसकी सबसे ज्यादा पैदावार कोस्टा रिका (मध्य अमेरिका देश) में है जो 52.5 मिलियन हैक्टेयर है। फलों के अन्तर्गत केले का क्षेत्र 12.36 प्रतिशत है और देश में दूसरा सबसे महत्वपूर्ण फल है। इसके उत्पादन में भारत का स्थान सर्वप्रथम है। यह विश्वभर में केला उत्पादन में 23 प्रतिशत का योगदान करता है। देश में पाँच सबसे महत्वपूर्ण केला उत्पादक राज्यों में महाराष्ट्र, तमिलनाडु, गुजरात, कर्नाटक एवं आंध्रप्रदेश हैं। इन राज्यों की देश में केला उत्पादन में 70 प्रतिशत से ज्यादा भागीदारी है। इन राज्यों का अलग-अलग उत्पादन तालिका 1 में दिया गया है। सिक्किम मे यह चौथा बहुत महत्वपूर्ण फल है व पूरे राज्य में यह किचन गार्डन में, खेतों की सीमाओं पर उगाया जाता है। बिहार, बंगाल व भारत के अन्य राज्यों से उच्च उपज वाली किस्मों जैसे डूवार्ड केवेन्डिश के आने से सन् 1976 से बगीचों में केले को उगाने की परम्परा शुरू हुई भारत में मुख्य केला उत्पादक राज्यों में केले का उत्पादन तालिका 1: (2010-11) कृ. स. राज्यं उत्पादन (000 मीट्रिक टन) 1. तमिलनाडु 8253.0 2. महाराष्ट्र 4303.0 3. गुजरात 3978. 0 4. अांध्रप्रदेश 2774.8 5. कर्नाटक 2281.6 केला एक कोमल तने वाला पौधा है जिसकी पैदावार उष्णकटिबंधीय एवं उपोष्ण क्षेत्रों में ज्यादा होती है। इसका वानस्पतिक नाम मूसा एक्यूमिनाटा है। इसे सबसे अधिक पौष्टिक फलों की श्रेणी में रखा गया है। दूसरे फलों की अपेक्षा यह पेट के लिए बहुत फायदेमंद होता है एवं बिल्कुल भी गरिष्ठ नहीं होता है। इसमें शर्करा एवं स्टार्च उच्च मात्रा में होते हैं जिसके कारण इसे पौष्टिक गुण एवं ऊर्जा का अच्छा स्रोत माना जाता है। इसके अलावा इसमें विटामिन ए, सी, पोटेशियम, कैल्शियम्, सोडियम, मैग्नीशियम एवं लौह तत्व भी भरपूर मात्रा में पाये जाते हैं। जैविक दृष्टि से केला अत्यधिक विकारीय फल होता है एवं इसे फ़िज में रखकर संरक्षित नहीं किया जा सकता है। जलवायु एवं मृदा यह उष्णकटिबंधीय फसल नमी वाले मौसम में सालभर उगायी जाती है। केले के लिए उचित तापमान 25-30 डिग्री सेल्सियस के बीच है। इसके लिए मृदा का पी. एच. 5.5 से 7.5 तक होना चाहिए। केले का क्षेत्र, उत्पादन व उत्पादकता का वर्तमान दृश्य तालिका 2 में दिया गया है। भारत में केले की प्रति हेक्टेयर उत्पादकता विश्व की दोगुनी उत्पादकता से भी ज्यादा है। यद्यपि विश्व के कुल उत्पादन का लगभग 23 प्रतिशत भारत में उत्पादित होता है परन्तु अन्य देशों की तुलना में निर्यात नगण्य है। भारतीय केले का निर्यात मुख्यतः सऊदी अरब व अन्य अरब देशों में होता है। केले का क्षेत्र, उत्पादन एवं उत्पादकता तालिका 2 क्षेत्र (हेक्टेयर) उत्पादन (000 टन) औसत उत्पादकता (टन/हेक्टेयर) विश्व 4544702 69280 15.20 भारत 529700 16225 30.63 केले के छिलके की गुणवत्ता केले के एक फल का औसत वजन 125 ग्राम होता है जिसमें लगभग 7.5 प्रतिशत नमी व 2.5 प्रतिशत शुष्क पदार्थ होता है। इनमें विटामिन बी6 उच्च मात्रा में होता है जो संक्रमण से शरीर को सुरक्षित रखता है एवं यह हीमोग्लोबिन के लौह तत्च वाले हिस्से ‘हीम’ के निर्माण में जरूरी है। यह विटामिन सी, पोटेशियम से भी भरपूर है व खाद्य रेशे का बहुमूल्य स्रोत है। केले के फल की गुणवत्ता के साथ ही, इसका छिलका भी पोषक तत्वों से भरपूर है। इसका छिलका अभी तक अनुपयोगी माना जाता है और इसे बड़े पैमाने पर गड्ढों में डाल दिया जाता है जो कि पानी को दूषित करता है। केले के छिलके पर सीफेट में हुए शोध के अनुसार, इस समस्या का समाधान व इसका उपयोग करके मूल्यवर्धित उत्पाद बनाये जा सकते हैं जिन्हें मानव उपभोग में प्रयुक्त किया जा सकता है। केले के छिलके में स्टार्च, प्रोटीन, वसा, लौह तत्व, रेशा आदि प्रचुर मात्रा में पाये जाते हैं। रेशा बहुत सी बीमारियों के रोकथाम में सहायक माना गया है जैसे कार्डियोवैस्कुलर बीमारियां, कब्ज, कोलन कैंसर, मधुमेह आदि। केले के छिलके के रेशे की गुणवत्ता अन्य फलों के छिलकों की तुलना में अच्छी होती है क्योंकि इसमें काफी अच्छी मात्रा में घुलनशील रेशे होते हैं। पके कले के छिलके के पोषक तत्व एवं भौतिक रासायनिक गुणों की जानकारी क्रमशः तालिका 3 व 4 में दी गयी है। पके केले के छिलके में उपस्थित पोषक तत्व तालिका 3: पोषक तत्व छिलका पाउडर, प्रतिशत कार्बोहाइड्रेट्रा 68.17 प्रोटीन 7.35 वसा 4.96 खनिज लवण 13.77 खाद्य रेशा (फाइबर) 12.30 खाद्य रेशा (घुलनशील) 6.98 खाद्य रेशा (अघुलनशील) 38.84 स्टार्च 3.92 लौह तत्व 0.795 मि.ग्रा कैल्शियम 50 मिग्रा पके केले के छिलके के भौतिक एवं रासायनिक गुण तालिका 4 भौतिक रासायनिक गुण छिलका पाउडर नमी 5.75 पी.एच. 5.32 श्यानता (विस्कोसिटी) 56 जलधारण क्षमता (40 डिग्री सेसियस) 6.8 ग्रा. जलधारण क्षमता (60 डिग्री सेल्सियस) 6.12 ग्रा जलधारण क्षमता (80 डिग्री सेल्सियस) 6.२३ ग्रा. तेल धारण क्षमता (40 डिग्री सेल्सियस) 2 ग्रा. तेल धारण क्षमता (60 डिग्री सेल्सियस) 3.15 ग्रा तेल धारण क्षमता (80 डिग्री सेल्सियस) 3.53 ग्रा पके केले के छिलके से पाउडर बनाने की प्रक्रिया पके केले के छिलके से पाउडर बनाने के लिए सर्वप्रथम इसके छिलके को चाकू की सहायता से उतार लेते तत्पश्चात् छिलकों को छोटे-छोटे टुकड़ों में काट लिया जाता है। इन टुकड़ों को 0.5 प्रतिशत सिट्रिक अम्ल में 10 मिनट के लिए डुबोकर छोड़ देते हैं। इससे छिलके का रंग गहरे भूरे रंग में परिवर्तित नहीं होता है। यह रंग परिवर्तन एंजायमेटिक ब्राउनिंग के कारण होता है।दस मिनट के बाद छिलके के टुकड़ों सिट्रिक अम्ल के घोल से निकालकर इनको हॉट ट्रे ड्रायर में 60 सेल्सियस तापमान पर सुखाते हैं। इसके बाद ग्राइंडर की सहायता से पीस कर पाउडर बना लेते हैं।इस पाउडर को 40 नंबर मेश की छलनी से छानकर वायुरहित प्लास्टिक के डिब्बों में सील करके, 15 सेल्सियस तापमान पर ठंडे कमरे में भंडारित कर सकते हैं। पके केले के छिलके का मूल्य संवर्धन हेतु बेकरी उत्पादों में उपयोग तेल, दूध पाउडर, ग्लूकोज इत्यादि से बनाया जाता है। सीफेट में हुए शोध में छिलका पाउडर को मैदा की जगह (2.5 से 7.5 प्रतिशत तक) प्रतिस्थापित किया गया एवं बिस्कुट बनाए गए। इस प्रकार चार विभिन्न प्रकार के बिस्कुट बनाए गए जिनके पोषक तत्वों का विश्लेषण किया गया। इस बिस्कुटों के पोषक तत्व तालिका 5 में दिये गये हैं। इस छिलके का प्रयोग बिस्कुट या अन्य उत्पाद की गुणवत्ता को बढ़ाता है। इससे बने बिस्कुट अच्छे स्वाद वाले, खाद्य रेशे एवं खनिज लवण जैसे लौह तत्व व कैल्शियम से भरपूर होते हैं जो कि पूरी तरह से मैदा से बने बिस्कुट (सामान्य बिस्कुट) की तुलना में ज्यादा पोषण प्रदान करने वाले होते हैं। इनमें खाद्य रेशे होने के कारण बिस्कुट थोड़े कठोर बनते हैं इसलिए आटा बनाते समय पानी की मात्रा पोषक तत्व सामान्य बिस्कुट 2.5% केला छिलका पाउडर युक्त बिस्कुट 5% केला छिलका पाउडर युक्त बिस्कुट 7.5% केला छिलका पाउडर युक्त बिस्कुट नमी,% 1 .82 2.72 3.00 2.60 प्रोटीन, % 6.87 7.87 8.05 8.22 वसा, % 16.08 16.18 16.54 16.86 खनिज लवण, % 1.04 1.34 1.58 1.86 लौहृ तत्च (मि.ग्रा./100ग्रा.) 0.25 0.22 0.24 0.296 बढ़ानी पड़ती है। छिलके के प्रयोग से बिस्कुट का रंग गहरा भूरा व सतह खुरदरी हो जाती है। इन बिस्कुट के संवेदी विश्लेषण करने पर 7.5 प्रतिशत छिलका पाउड़र से प्रबलीकृत बिस्कुट ज्यादा रेशे के बावजूद स्वीकार्य पाये गये। इस प्रकार प्रबलीकरण का स्तर बदलकर विभिन्न खाद्य उत्पादों में केले के छिलके का उपयोग खनिज लवणों एवं सस्ते व असाधारण स्रोत्र के रुप में किया जा सकता है। स्त्रोत : सीफेट न्यूजलेटर, लुधियाना( इन्दु कार्की, शशी प्रभा, दीपक राज राय, मोनिका शर्मा एवं दीपिका गोस्वामी तकनीकी हस्तांतरण प्रभाग, सीफेट लुधियाना)