वर्मीकम्पोस्ट या वर्मीकास्ट एक श्रेष्ठतम खाद है, जिसे बनाने के लिए विशेष प्रकार के केंचुओं का उपयोग होता है। आमतौर पर ये मृदा में रहते हैं और जैव पदार्थ खाकर उन्हें पचे हुये रूप में उत्सर्जित कर देते हैं। यह खाद पौधों के लिए आवश्यक स्थूल और सूक्ष्म पोषक तत्वों का एक सर्वोत्तम स्रोत है। केंचुओं के माध्यम से जैविक कचरे से खाद बनाने की इस प्रक्रिया को वर्मीकम्पोस्टिंग कहा जाता है। केंचुओं में सभी जैव-अवक्रमणशील सामग्रियों को खाद में परिवर्तित करने की क्षमता होती है। तैयार कम्पोस्ट, ह्यूमस की अधिकता से दानेदार काले-भूरे रंग का होता है।इसके साथ ही इसमें मृदा के लिए आवश्यक सभी पोषक तत्वों की मात्रा भी अधिक होने के कारण इसे ‘काले सोने’ की संज्ञा दी गई है। प्रतिदिन एक केंचुआ अपने शरीर भार के बराबर या 4-5 गुना जैविक अपशिष्ट खाकर उसे कम्पोस्ट में परिवर्तित कर सकता है। एक कि.ग्रा. केंचुए, एक वर्गमीटर क्षेत्र में 45 कि.ग्रा. अपघटनशील पदार्थ से 25-30 कि.ग्रा. वर्मीकम्पोस्ट सिर्फ 60-70 दिनों में तैयार कर देते हैं। केंचुओं के प्रकार सामान्यतः केंचुए तीन प्रकार के होते हैंः सतह पर रहकर खाने वाले(ऐपीजेइक) ये मृदा की सतह के पास ही खाते हैं। ये मुख्य रुप से पौधे के कूड़े, मृत जड़ों और अन्य पौधों के मलबे पर आश्रित रहते हैं। ये केंचुए वर्मीकम्पोस्टिंग के लिए महत्वपूर्ण हैं। सतह के नीचे रहकर खाने वाले (एंडोजेइक/जिओफेगस) इस प्रकार के केंचुए मृदा की सतह के नीचे गहराई में खाते हैं। ये वर्मीकम्पोस्टिंग के लिए उपयुक्त नहीं हैं। भूगर्भ में रहकर खाने वाले (डायोजेइक): ये मृदा की सतह के नीचे 1-3 मीटर नीचे गहराई में खाते हैं। ये केंचुए भी वर्मीकम्पोस्टिंग के लिए उपयुक्त नहीं हैं। ढेर विधि गड्ढा/कुंड पद्धति के समान आकार में सीधे ही जमीन की सतह पर गोबर व अन्य अपशिष्ट पदार्थों को परत दर परत डालकर गुम्बदनुमा ढेरी बनायें, जिसकी ऊंचाई 0.5-0.75 मीटर हो। उचित जल निकास के कारण यह प्रणाली अधिक वर्षा वाले क्षेत्रों के लिए फायदेमंद है। वर्मीकल्चर तकनीक हेतु केंचुए की कुछ महत्वपूर्ण प्रजातियां हैं: इसेनिया फोइटिडा (रेड रिंकलर/यइगर वर्म), यूड्रिलस यूजेनियाई (अफ्रीकन वर्म), फेरियोनिक्स एक्सकेवेटस (एशियन वर्म), लुम्ब्रिकस रूबेलस, लैम्पिटो मौराइटी और ओक्टोकैटोमा सेराटा इत्यादि। इनमें से यूड्रिलस यूजेनियाई नामक केंचुए वर्मीकम्पोस्टिंग के लिए सर्वोत्तम माने जाते हैं। वर्मीकम्पोस्टिंग की विधियां केंचुए से खाद बनाने के निम्न दो तरीके हैं: गड्ढा/कुंड विधि इस पद्धति में जमीन के अन्दर/ऊपर उचित आकार का गड्ढा/कुंड तैयार किया जाता है। इसे ईंट-सीमेन्ट व पत्थर से पक्के फर्श व दीवारों वाला बनायें तथा गोबर व अन्य अपशिष्ट की उपलब्धता के अनुसार इसकी लंबाई बड़ी या छोटी रखें। आदर्श गड्ढे की लंबाई, चौड़ाई, गहराई हेतु क्रमश: 5.0 मीटर x 1.0 मीटर x 0.75 मीटर आकार उपयुक्त माना गया है। एक से अधिक कम्पोस्ट पिट बनाने के लिए समान आकार के दो गड्ढे/ वर्माकम्पास्ट के लाभ मृदा को ढीला करके इसमें वायु का प्रवेश तथा मृदा की जलधारण क्षमता बढ़ती है। केंचुए और सहयोगी जीवाणुओं के स्राव अन्य पोषक तत्वों के साथ वृद्धि नियंत्रक का कार्य करते हैं। लंबे समय तक इसका उपयोग मृदा की भौतिक, रासायनिक व जैविक संरचना में सुधार करता है। रासायनिक खादों एवं कीटनाशकों की मात्रा का प्रयोग काफी हद तक कम किया जा सकता है। कुंड के बीच 0.5 से 1.0 मीटर की जगह छोड़नी चाहिए, ताकि दोनों तरफ से काम करने में आसानी रहे। यह प्रणाली कम वर्षा वाले शुष्क क्षेत्रों के लिए लाभदायक है। वर्मीकम्पोस्ट प्रक्रिया स्थान का चयन वर्मीकम्पोस्ट क्यारी का स्थान ऊंचाई पर एवं ठंडा (15-25 डिग्री सेल्सियस) व छायादार होना चाहिए। अपघटनशील कचरे की छंटाई एवं पूर्व उपचार कम्पोस्टिंग से पहले अपशिष्ट पदाथों की छंटाई द्वारा अपघटन योग्य कचरे को अलग रख लें। फसल अवशेषों जैसे डंठल व खूट इत्यादि को सीधे ही क्यारी में काम में नहीं लेकर पहले गड्ढे में परत दर परत जमायें और 10 दिनों बक पानी का छिड़काव करें। कृषि अपशिष्टों को पशुओं के गोबर के साथ 3:1 के अनुपात में काम में लेना चाहिए। लिग्निनयुक्त अपशिष्ट को अवक्रमणकारी कवक द्वारा उपचारित करें। कम्पोस्ट पिट/क्यारी को काबनिक अपशिष्ट से भरना क्यारी बनाने के लिए कचरे को सैंडविच की तरह क्रमिक रूप से परत दर परत बिछाने की पद्धति सारणी-1 में दर्शायी गयी है। अपशिष्ट पदार्थों की प्रत्येक परत 7-10 सें.मी. (3-4 इंच) मोटी हो तथा प्रत्येक परत को भरने के दौरान एवं पूरी क्यारी भर जाने के बाद लगभग 10 दिनों तक आवश्यकतानुसार पानी छिड़ककर गीला करते रहें। ध्यान रहे, वौं क्यारी पर ताजा व कच्चा गोबर तथा बिना उपचारित सूखा कचरा नहीं डालें। सारणी 1. कम्पोस्टिंग की विभिन्न पर परतें परत/लेयर कम्पोस्टिंग के लिए उपयोगी जैव-अवक्रमणशील कार्बनिक अपशिष्ट सातवीं गोबर/ तैयार खाद/ बायोगैस का अपशिष्ट (गीला कचरा) छठी अनाज का भूसा सूखे पत्ते /फसल अपशिष्ट (सूखा कचरा जो पूर्व-उपचारित किया हो) पांचवीं रसोई घर की सब्जी/ अन्य कचरा/पशुओं की का ठाण /चारा व अपशिष्ट (गीला कचरा) चाैथी अनाज का मूसा/सूखे पत्ते/ फसल अपशिष्ट (सूखा कचरा जो पूर्व उपचारित किया हो) तीसरी गोबर/तैयार/खाद बायोगैस का अपशिष्ट (गीला कचरा) दूसरी सूखे फसल अपशिष्ट (बिना उपचारित सूखा कचरा) पहली मिट्टी/ रेत/लकड़ी का बुरादा (कुंड में बने कम्पोस्ट पिट /गड्ढे के लिए) नीम/आक/ नीचे की) करंज आदि के पते (सतह पर बने कम्पोस्ट/ क्यारी/ ढ़ेर के लिए) भरी हुई कम्पोस्ट क्यारी में केंचुए छोड़ना प्रति वर्ग मीटर क्षेत्र की कम्पोस्ट क्यारी के लिए केंचुओं की अनुमानित इष्टतम संख्या 1800 है अर्थात 1.5 से 2.0 कि.ग्रा. केंचुओं की आवश्यकता होती है। वर्मी क्यारी की देखभाल क्यारी में नमी (60 प्रतिशत से अधिक) एवं तापमान (15-20 डिग्री सेल्सियस) बनाए रखने हेतु नियमित अंतराल पर पानी का छिड़काव सर्दियों में एक बार एवं गर्मियों में दो बार करें। केंचुओं के प्राकृतिक दुश्मनों जैसे-कोट, लटें, चीटियां, चूहे, सांप, नेवले, कुत्ते आदि से बचाने का समुचित प्रबंधन करें। तैयार वर्मीकम्पोस्ट का एकत्रीकरण व भंडारण केंचुए छोड़ने के लगभग 45-50 दिनों में खाद एकत्रित करने के लिए तैयार हो जाती है। इसे इकट्ठा करने के 4-5 दिनों पहले पानी का छिड़काव बंद कर दें। तैयार खाद को ऊपरी सतह से इकट्ठा करने के लिए हाथ या कांटेदार खुरपी का उपयोग करें। एकत्रित करने के बाद वर्मीकम्पोस्ट को छान लें। छनी हुई खाद को नमी के अनुसार 12-24 घंटे के लिए छाया में सुखाएं और भंडारण के लिए बैग में भरकर छायादार स्थान पर रखें। सारणी 2 वर्मीकम्पोस्ट में आवश्यक पोषक तत्वों की मात्रा क्र.सं. पोषक तत्व मात्रा एक टन वर्मीकम्पोस्ट से उपलब्ध मात्रा (कि.ग्रा.) 1 कार्बनिक पदार्थ 30-40 प्रतिशत 300-400 2 नाइट्रोजन 1.5-20 प्रतिशत 15-20 3 फॉस्फोरस २.0-2.5 प्रतिशत 20-25 4 पोटाश 0.6-0.8 प्रतिशत 6-8 5 फेरस (लोहा) 120000-125000 पी.पी.एम. 120-125 6 जिंक 100-150 पी.पी.एम. 0.10-0.15 7 कैल्शियम 150-160 पी.पी.एम. 0.15-0.16 8 मैंगनीज 200-250 पी.पी.एम 0.20-0.25 9 कॉपर (तांबा) 20-30 पी.पी.एम. 0-02-0.03 वर्मीकम्पोस्ट का फसलों में प्रयोग कृषि में सामान्यतः 5 टन/हैक्टर की दर से फसलों में तथा फलों, छोटे पौधों में 500 ग्राम, बड़े पौधों में 3-4 कि.ग्रा./पेड़ की दर से और सब्जियों के लिए 3 कि.ग्रा./10 वर्ग मीटर क्षेत्र की दर से उपयोग करें। गमलों में 150-300 ग्राम की दर से उपयोग करें। वर्मीकम्पोस्ट के लाभ मृदा को ढीला करके इसमें वायु का प्रवेश तथा मृदा की जलधारण क्षमता बढ़ती है। केंचुए और सहयोगी जीवाणुओं के स्राव अन्य पोषक तत्वों के साथ वृद्धि नियंत्रक का कार्य करते हैं। लंबे समय तक इसका उपयोग मृदा की भौतिक, रासायनिक व जैविक संरचना में सुधार करता है। रासायनिक खादों एवं कीटनाशकों की मात्रा का प्रयोग काफी हद तक कम किया जा सकता है। स्त्राेत : खेती पत्रिका(भा.कृ.अनु.प.), कृष्ण गोपाल व्यास-विषय विशेषज्ञ (सस्य विज्ञान), सुनील कुमार शर्मा-विषय विशेषज्ञ (कृषि प्रसार शिक्षा), कृषि विज्ञान केन्द्र, स्वामी केशवानन्द राजस्थान कृषि विश्वविद्यालय, पोकरण, जैसलमेर(राजस्थान)।