<h3 style="text-align: justify;">नैनो तरल यूरिया</h3> <p style="text-align: justify;">भारत, दुनिया का ऐसा पहला देश बना है, जहां नैनो तरल यूरिया लॉन्च हो गई है। इसे किसानों की सहकारी संस्था इफको ने तैयार किया है। खेती में बड़ा बदलाव लाने वाले इस उत्पाद के पीछे एक किसान के बेटे की मेहनत और शोध है, नाम है डा. रमेश रालिया। विश्व में पहली बार तरल रूप में इस तरह की यूरिया लांच की गई है। इससे किसानों को अपने खेतों में यूरिया देने में आसानी होगी और पफसल को भी अधिक फायदा होगा। खेतों में बेकार चले जाने वाले यूरिया की बर्बादी भी रुकेगी।</p> <h3 style="text-align: justify;">किसानों के लिए सौगात</h3> <p style="text-align: justify;">नैनाे यूरिया लॉन्च करते हुए इफकाे ने कहा कि भारत ऐसा करने वाला दुनिया का पहला देश है। इफको के एमडी ने इस उत्पाद को किसानों के लिए सौगात बताया। यह आधा लीटर (500 मि.ली.) का डिब्बा वही काम करेगा, जो 45 कि.ग्रा. वाली यूरिया की बोरी करती थी। किसी भी पौधे या फसल की बढ़ोतरी के लिए नाइट्रोजन की जरुरत होती है। मौजूदा खेती में यूरिया, नाइट्रोजन का सबसे बड़ा स्रोत है, लेकिन जितना यूरिया का खेतों में प्रयोग किया जाता है, उसका मुश्किल से 30 से 40 फीसदी भाग पौधों के काम आता है। बाकी हवा और मृदा में बेकार चला जाता है, जो हवा में जाता है वह पर्यावरण के लिए हानिकारक ग्रीनहाउस गैसों का कारण बनता है। दूसरी ओर मृदा में जो भाग जाता है उससे मृदा अम्लीय होती है और भूमिगत पानी दूषित होता है। नैनो यूरिया इन सब खामियों को काफी दूर कर सकता है। इंडियन फार्मर्स फर्टिलाइजर कोआपरेटिव लिमिटेड (इफको) ने 31 मई को इस नैनो यूरिया तरल को किसानों को समर्पित किया। इफको की नैनो यूरिया तरल के पीछे डा. रमेश रालिया का शोध और मेहनत है। डा. रमेश रालिया इफको के गुजरात के गांधीनगर के कलोल में स्थित रिसर्च सेंटर 'नैनो जैवप्रौद्योगिकी अनुसंधान केन्द्र' के रिसर्च एंड डेवलपमेंट सेंटर के जनरल मैनेजर हैं।</p> <h3 style="text-align: justify;">नैनो टेक्नॉलोजी में 15 पेटेंट </h3> <p style="text-align: justify;">किसान के बेटे डा. रमेश रालिया के नाम नैनो टेक्नॉलोजी में फिलहाल 15 पेटेंट हैं। डा. रालिया ने नैनो यूरिया तरल को लेकर बताया, 'साधारण यूरिया' जो हम प्रयोग करते हैं पौधे केवल उसका 30-40 फीसदी ही उपयोग ले पाते हैं। यूरिया का बहुत बड़ा भाग हवा या जमीन में चला जाता है, जबकि नैनो यूरिया का 80 फीसदी उपयोग पौधे कर पाते हैं। यह इसका सबसे बड़ा फर्क है।'</p> <h3 style="text-align: justify;">नैनो यूरिया और साधारण यूरिया</h3> <p style="text-align: justify;">डा. रालिया, नैनो यूरिया और साधारण यूरिया के रासायनिक फर्क को साधारण शब्दों में बताते हैं- 'साधारण यूरिया को पौधा ऑयन के रूप में लेता है, जो नैनो यूरिया को पार्टिकल के रूप में होता है। पार्टिकल ऑयनों का एक समूह होता है। ऑयन रिएक्टिवेट (रसायन प्रतिक्रिया की अवस्था-जिसके रासायनिक गुण अन्य पदार्थों से मिलने से परिवर्तित हो जाएं) की स्थिति होती है, जबकि पार्टिकल (कण) एक स्टेबल (स्थिर) अवस्था होती है। स्थिर रूप में होने के कारण कण पौधे के अंदर पहुंचकर नाइट्रोजन छोड़ते हैं, जिससे नाइट्रोजन को पौधा बहुत अच्छे तरीके से ग्रहण कर पाते हैं। साधारण यूरिया सफेद दानों के रूप में होता है और इसका फसल में छिड़काव किया जाता है। ये दानें हाइड्रोलाइज (गलते) होते हैं। फिर पौधे उसे ऑयन के रूप में ग्रहण करते हैं, जबकि नैनो तरल यूरिया के कण (नैनोपार्टिकल) एक मीटर के एक अरबवें हिस्से के बराबर होते हैं, जिससे वे पौधे में सीधे प्रवेश कर जाते हैं।</p> <table style="border-collapse: collapse; width: 100%;" border="1"> <tbody> <tr> <td style="width: 98.6025%;"> <h3>किसान के बेटे ने बनाया नैनो तरल</h3> <p style="text-align: justify;">यूरिया डा. रालिया अमेरिका की वाशिंगटन यूनिवर्सिटी में वैज्ञानिक रह चुके हैं। इनकी माता भंवरी देवी और पिता पारसराम दोनों किसान हैं। वर्ष 2013 उनके जीवन में बदलाव लेकर आया। वर्ष 2009 में जोधपुर स्थित भाकृअनुप-केंद्रीय शुष्क क्षेत्र अनुसंधान संस्थान (काजरी) में विश्व बैंक द्वारा कृषि नैनो टेक्नोलॉजी के पहले प्रोजेक्ट में रिसर्च एसोसिएट के रूप में उनका चयन हुआ था। पीएचडी के दौरान ही उन्हें अमेरिका से बुलावा आ गया था।</p> <p style="text-align: justify;"><img class="image-inline" src="https://static.vikaspedia.in/mediastorage/image/cccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccccPIC.jpg" width="65" height="156" /></p> <p style="text-align: justify;">डा. रालिया बताते हैं कि पीएचडी के दौरान वाशिंगटन यूनिवर्सिटी, अमेरिका से वहां के विभागाध्यक्ष ने उनकी काजरी की लैब विजिट की। उन्होंने रिसर्च वर्क देखा। अमेरिका में काम करते हुए उन्होंने 60 से ज्यादा देशों के प्रतिनिधियों के साथ नैनो तकनीक पर काम किया। फिलहाल वे भारत में हैं और नैनो तरल यूरिया के जरिए खेती में नईक्रांति का जरिया बने हैं। किसानों को नैनो तरल यूरिया 15 जून के बाद उपलब्ध होगा। एक लीटर पानी में 2 मि.ली. नैनो तरल यूरिया मिलाकर पौधे के जीवन में इसका सिर्फ दो बार छिड़काव करना है।</p> </td> </tr> </tbody> </table> <p style="text-align: justify;">वर्ष 2019 में इस उत्पाद का भारत में देशव्यापी परीक्षण शुरु किया गया था। देश के 30 एग्रो क्लाइमेटिक जोन के 11000 किसानों के खेतों में 94 फसलों पर इसका 2 वर्ष तक ट्रायल किया गया है। भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (भाकृअनुप) के 20 से ज्यादा संस्थानों और कृषि विश्वविद्यालयों में इसका परीक्षण हुआ है। जलवायु परिवर्तन, बढ़ते प्रदूषण और खेती की बढ़ती लागत को देखते हुए इस उत्पाद पर लोगों की निगाहें टिकी हैं। वैज्ञानिकों के अनुसार यूरिया का बहुत बड़ा भाग नाइट्रस ऑक्साइड के रूप में ग्रीनहाउस गैस के रूप में जाता है। उसे नैनो यूरिया के रूप में हम बचा सकते हैं। यूरिया के असंतुलित प्रयोग से मृदा में पी-एच संतुलन बिगड़ जाता है। इतना ही नहीं अमोनिया के कारण जमीन अम्लीय हो जाती है।</p> <p style="text-align: justify;">स्त्राेत : खेती पत्रिका, भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद(आईसीएआर), नई दिल्ली।</p>