सी-वीड एवं आजीविका में बढ़ाेत्तरी देश के तटीय क्षेत्रों में रहने वाले किसान समुद्री शैवाल यानी सी-वीड के जरिए अपनी आजीविका बढ़ा सकें, इसके लिए सरकार कई तरह से प्रयास कर रही है। समुद्री शैवाल दुनियाभर में पाया जाता है और यह पोषक तत्वों से भरपूर होता है। इसकी कई प्रजातियों को भोजन, पशुचारा और उर्वरक के इस्तेमाल किया जाता है। समुद्री शैवाल के उत्पादन को बढ़ावा देने के लिए गुजरात के भावनगर में स्थित केंद्रीय नमक व समुद्री रसायन अनुसंधान संस्थान, पिछले कई वर्षों से काम कर रहा है। शैवाल उत्पादन की अपार संभावनाएँ भारत में लगभग 8,118 मी समुद्र तटीय क्षेत्र है, जहां पर समुद्री शैवाल के उत्पादन की अपार संभावनाएं हैं। प्रधानमंत्री मत्स्य संपदा योजना प्रधानमंत्री मत्स्य संपदा योजना के तहत इसके लिए पांच वर्ष की परियोजना शुरू की गई है, जिस पर 640 करोड़ रुपए खर्च किए जानेहैं। इस योजना के तहत केंद्र सरकार तटीय राज्यों के मछुआरों को शैवाल के उत्पादन के लिए प्रोत्साहित कर रही है। मकसद यह है कि महिलाओं को इस क्षेत्र में आगे आने का मौका दिया जाए, जिससे मछुआरों के परिवारों की आय में इजाफा हो। सरकार समुद्री शैवाल के उत्पादन के लिए रॉफ्ट आदि बनाने के लिए सब्सिडी भी दे रही है। प्रमुख सी-वीड उत्पादक देश संयुक्त राष्ट्र के खाद्य एवं कृषि संगठन के अनुसार, दुनियाभर में लगभग 30.1 मिलियन टन सी-वीड का उत्पादन हो रहा है। इसमें से 95 प्रतिशत उत्पादन खेती के जरिए 5 प्रतिशत उत्पादन प्राकृतिक तरीके से उगे समुद्री शैवाल से मिलता है। चीन, जापान, कोरिया, इंडोनेशिया, फिलीपींस, मलेशिया और वियतनाम प्रमुख सी-वीड उत्पादक देश हैं। समुद्री शैवाल एवं फसल उत्पादकता केंद्रीय नमक व समुद्री रसायन अनुसंधान संस्थान के वैज्ञानिकों के अनुसार, समुद्री शैवाल कई प्रकार के होते हैं। भारत में प्राकृतिक रूप से हरे शैवाल की 900, लाल शैवाल की 400 और भूरे शैवाल की 1500 प्रजातियां पाई जाती हैं। इनमें से 221 तरह की किस्मों का प्रयोग विभिन्न उत्पाद बनाने में होता है, जिसमें 145 खाद्य उत्पाद और 110 का फाइकोकोलोइड्स उत्पादन के लिए इस्तेमाल होता है। वैज्ञानिकों के अनुसार कुछ सी-वीड ऐसे हैं, जिनसे हमें बहुत से महत्वपूर्ण उत्पाद मिलते हैं। उदाहरण के लिए सी-वीड से हमें बायो स्टीमुलेंट मिलता है, जिसके प्रयोग से फसलों की उत्पादकता में 16 से 40 प्रतिशत तक वृद्धि संभव है। भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के कई संस्थानों ने इस पर शोध भी किया है। महिलाओं की आय का अलग जरिया देश में जिस तरह से जैविक खेती काे बढ़ावा दिया जा रहा है, उसमें सी-वीड से बने उत्पाद मददगार बन सकते हैं। सी-वीड के उत्पादन से गरीब मछुआरों को लाभ होगा, जैसे-जैसे इसकी मांग बढ़ेगी, वैसे ही इसका दायरा भी बढ़ेगा। गुजरात और तमिलनाडु में इस पर काम हो रहा है। सी-वीड का उत्पादन ज्यादातर महिलाएं ही करती हैं। इससे महिलाओं को आय का अलग जरिया भी मिल जाता है। लंबे सागर तट भारतीय शोधकर्ता लंबे समय से टिकाऊ खेती के तौर पर समुद्री शैवाल की खेती अपनाने पर जोर दे रहे हैं। उष्णकटिबंधीय मौसम, उथले पानी और पोषक तत्वों की प्रचुरता के कारण भारत के लंबे सागर तट इसके लिए आदर्श हैं। गुजरात और तमिलनाडु के सागर क्षेत्रा में इनकी समृद्ध जैव विविधता है। तमिलनाडु के 1,000 कि.मी. लंबे सागर तट के पास ही लगभग 282 तरह की समुद्री शैवाल प्रजातियां मिलती हैं। हालांकि भारत में कुछ ही किस्मों की ही खेती होती है। समुद्री शैवाल की खेती एवं सब्सिडी भारत की अर्थव्यवस्था कृषि प्रधान है। यहां की 60 फीसद जमीन खेती के काम आती है, लेकिन करीब 47 प्रतिशत कृषि योग्य भूमि मिट्टी कटाव के कारण नष्ट हो रही है। मिट्टी को होने वाले इस नुकसान का लगभग एक-तिहाई हिस्सा पानी से होने वाला कटाव है। लेकिन समुद्री शैवाल की खेती में पानी भी समाधान का हिस्सा हो सकता है। समुद्री शैवाल आयोडीन, विटामिन और प्रोटीन के अच्छे स्रोत हैं। इनमें कुपोषण का मुकाबला करने की क्षमता है। इसी को देखते हुए देश में भारत सरकार ने अगले पांच वर्षों में समुद्री शैवाल की खेती को बढ़ावा देने के लिए 8.7 करोड़ की सब्सिडी देने का ऐलान किया है। जलवायु परिवर्तन रोकने में भी मददगार है सी-वीड सागर तट के पास उगने वाले समुद्री शैवाल जलवायु परिवर्तन रोकने में मददगार हैं। इसके अलावा ये भोजन का स्थायी स्रोत भी बन सकते हैं। भारतीय आयुर्वेद में हजारों वर्षों से इनका इस्तेमाल हो रहा है, लेकिन भारतीय संस्कृति में सी-वीड को वह जगह नहीं मिली है, जो एशिया के अन्य देशों में है। समुद्री शैवाल की खेती के फायदे, इससे मिलने वाले पोषण तक सीमित नहीं हैं। ये प्रकाश संश्लेषण के जरिये भोजन तैयार करते हैं, ठीक उसी तरह जैसे जमीन पर दूसरे पौधे करते हैं। समुद्री शैवाल कार्बनडाइऑक्साइड अवशोषित करते हैं। ये कार्बन को शर्करा में तब्दील करते हैं और पानी में ऑक्सीजनमुक्त करते हैं। वैज्ञानिकों ने एक शोध में सी-वीड की खेती की पहचान कार्बन सिंक के रूप में भी की है, जो जलवायु परिवर्तन की रफ्तार कम करने में मददगार हो सकती है। कार्बन इकट्ठा करने के अलावा, सी-वीड समुद्री भोजन की शृंखला बनाते हैं। पादप प्लवक के साथ ये कई समुद्री जीवों के लिए आश्रय और भोजन मुहैया करवाते हैं। स्त्राेत: अश्विनी कुमार निगम, भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद(आईसीएआर), नई दिल्ली।