भूमिका झारखंड राज्य के कुछ फसल-चक्रों में महत्वपूर्ण पोषक तत्वों की कमी की स्थिति निम्न प्रकार की पाई गई है: फसल-चक्र पोषक तत्वों की कमी वर्ष में तीन से चार बार एक ही खेत में सब्जी उगाने वाले क्षेत्र बोरॉन, कैल्शियम, सल्फर, मोलिब्डेनम धान-परती फ़ॉस्फोरस, सल्फर, कैल्शियम धान-मटर फ़ॉस्फोरस, सल्फर, कैल्शियम मूंगफली+अरहर फ़ॉस्फोरस, कैल्शियम, बोरॉन धान-सब्जी पोटाश मक्का-गेहूँ नेत्रजन पौधों पर आवश्यक पोषक तत्वों की कमी की पहचान फसल की प्रकृति एवं अवस्था के आधार पर की जाती है। इनमें पोषक तत्वों के कमी के लक्षण अलग-अलग ढंग से दिखते हैं। कुछ प्रमुख मुख्य पोषक तत्व एवं सूक्ष्म पोषक तत्वों के कार्य एवं कमी के लक्षण एवं उनका उपचार निम्न प्रकार है: नेत्रजन के कार्य व कमी के लक्षण एवं उपचार नेत्रजन के कार्य व कमी के लक्षण यह पौधों की वानस्पतिक वृद्धि में योग देता है। यह पत्तियों की हरा रंग प्रदान करता है। धान्य फसलों के दानों में प्रोटीन की मात्रा बढ़ाता है। नेत्रजन की कमी से पौधों का रंग हल्का हरा, बढ़वार सामान्य से कम और कल्लों की संख्या में कमी हो जाती है। पौधों की पत्तियों का रंग पीला या हल्का हरा हो जाता है। दाने वाली फसलों जैसे – मकई, धान आदि में सबसे पहले पौधे की निचली पत्तियाँ सूखना प्रारंभ कर देती है और धीरे-धीरे ऊपर की पत्तियाँ भी सूख जाती है। पत्तियों का रंग सफेद एवं पत्तियाँ कभी-कभी जल जाती है। हरी पत्तियों के बीच-बीच में सफेद धब्बे भी पड़ जाते हैं। वृक्षों पर फल पकने से पहले गिर जाते है। नेत्रजन उपचार पहला छिड़काव द्वारा एवं दूसरा मृदा में डालकर। नेत्रजन की कमी का उपचार खड़ी फसल के खेतों की निकाई-गुड़ाई के बाद कतार में यूरिया का छिड़काव कर अथवा यूरिया को 2-4 प्रतिशत का घोल बनाकर फसल के पत्तों पर छिड़काव लाभप्रद होता है। स्फूर (फास्फोरस) के कार्य व कमी के लक्षण एवं उपचार स्फूर के कार्य व कमी के लक्षण जड़ प्रणाली का विकास करता है। कोशिका विभाजन में सहायता करता है। फसलों को समय पर पकने में मदद करता है। धान्य फसलों में कल्लों की संख्या को बढ़ाता है जिसके फलस्वरूप बालियों एवं दानों की संख्या बढ़ती है। ऊर्जा रूपांतर, वसा, प्रोटीन एवं कार्बोहाइड्रेट बनाने में योग देता है। दलहनी फसलों की जड़ों की ग्रंथियों में स्थित राइजोबियम बैक्टिरिया की क्रियाशीलता को बढ़ाता है। फास्फोरस की कमी से पत्तियों का रंग गहरा हरा, बैगनी हो जाता है और पत्तियों का अग्रभाग मर जाता है। पौधों का रंग प्राय: गहरा ही रहता है पर निचली पत्तियाँ पीली होकर सूख जाती है। पौधों की वृद्धि रुक जाती है तथा पत्तियाँ पीली होकर सूख जाती है। पूर्णवृतों पर बैगनी रंग हो जाता है जैसे – मक्का में। गन्ने में पत्तियाँ संकरी तथा नीली हरी हो जाती है। आलू के भीतरी भाग में धब्बे पड़ जाते हैं। स्फूर उपचार खड़ी फसल पर स्फूर की कमी का उपचार संभव नहीं है। इसके लिए मिट्टी जाँच करवाकर अनुशंसित स्फूर की मात्रा को बुआई से पहले कम्पोस्ट के साथ मिलाकर डालने से पौधों के लिए स्फूर की उपलब्धता बढ़ जाती है। उर्वरक के रूप में एस.एस.पी. डी.ए.पी. एवं रॉक फ़ॉस्फेट को उपयोग में लाया जा सकता है। पोटाश के कार्य व कमी के लक्षण एवं उपचार पोटाश के कार्य व कमी के लक्षण कार्बोफाइड्रेट उपापचय में पोटाशियम की बहुत ही महत्वपूर्ण भूमिका होती है। इसलिए आलू, चुकन्दर, गन्ना जैसी फसलों के लिए यह आवश्यक है। धान्य फसलों, विशेषकर धान और गेहूँ में यह मजबूत और कड़े तने तैयार करता है, जिसके कारण पौधे गिरते नहीं है। बीज और फल को चमकीला और मजबूत बनाता है। पौधों में रोग निरोधी शक्ति को बढ़ाता है। कोशिकाओं में स्थित जल की मात्रा को नियंत्रित करके पोटाशियम पाला एवं सूखे से होने वाली हानि को कम करता है एवं पौधों की रक्षा करता है। यह पौधों के विभिन्न भागों में कार्बोहाइड्रेट के स्थानांतरण में मदद करता है। पोटाश की कमी से पत्तियों की किनारा कटा-फटा एवं उनका अग्र भाग भूरा हो जाता है। पत्तियाँ आकार में छोटी हो जाती है और उनकी वृद्धि रुक जाती है। पोटाश उपचार पोटाश की कमी को बुआई से पहले मिट्टी की जाँच से प्राप्त प्रतिवेदन के आधार पर पोटाश उर्वरक की अनुशंसा वाली मात्रा डालकर अथवा खड़ी फसल में पोटाशियम सल्फेट का 2-4 प्रतिशत घोल का छिड़काव कर उपचार किया जा सकता है। सल्फर (गंधक) के कार्य व कमी के लक्षण एवं उपचार सल्फर (गंधक) के कार्य व कमी के लक्षण यह एमिनों एसिड एवं प्रोटीन संश्लेषण के लिए आवश्यक है। क्लोरोफिल बनाने में मदद करता है। सरसों परिवार एवं प्याज परिवार के पौधों में तथा तीसी, सोयाबीन एवं मूंगफली में तेल की मात्रा को बढ़ाता हैं। गंधक दाल वाली फसलों में जड़ वृद्धि, बीज निर्माण एवं जड़ ग्रन्थियों के विकास में योग देता है। गंधक के अभाव में पौधे पीले, हरे, पतले और आकर में छोटे हो जाते हैं तथा पौधे का तना पतला और कड़ा हो जाता है। सल्फर (गंधक) उपचार दलहनी एवं तेलहनी फसलों वाली खेतों की मिट्टी में सल्फर की कमी को दूर करने के लिए एस.एस.पी. फास्फो जिप्सम एवं सल्फर मिश्रित उर्वरक का प्रयोग लाभप्रद होता है। बोरॉन के कार्य व कमी के लक्षण एवं उपचार बोरॉन के कार्य व कमी के लक्षण बोरॉन कोशिका-विभाजन एवं कोशिका की वृद्धि को प्रोत्साहित करता है। कार्बोहाइड्रेट बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है साथ ही कार्बोहाइड्रेट के स्थानांतरण में योग देता है। चुकन्दर, गाजर, फूलगोभी में इसकी कमी से पौधों का शीर्ष भाग मर जाता है और बगल से कलियाँ निकलने लगती है। पत्तियों की तने मरने लगती हैं एवं पत्तियाँ पीली हो जाती है। फसल में बोरॉन की कमी से उपज बहुत ही कम हो जाती है। कमी के लक्षण प्राय: नई निकलती हुई पत्तियों में पाये जाते हैं। पत्तियाँ मोटी एवं कड़ी होकर नीचे की ओर मुड़ जाती है, तने की फुनगी मर जाती है। धान में इस तरह के लक्षण देखे जाते हैं। बोरॉन की कमी से फूलगोभी, चुकन्दर इत्यादि में आंतरिक गलन हो जाता है। चना एवं मटर की फसल पर भी बोरॉन की कमी पाई जाती है। भूमि में उपलब्ध बोरॉन की कमी से फूलगोभी में भूरा रोग, लुसर्न में पीली फुनगी रोग,तम्बाकू में शिखर रोग एवं नींबू के फल कठोरपन से ग्रसित होते है। बोरॉन उपचार बुआई के पहले अच्छे ढंग से सड़ी कम्पोस्ट खाद तथा 10 से 15 कि./हें. बोरेक्स उर्वरक का प्रयोग करना चाहिए या इसकी पूर्ति के लिए बुआई के 10 दिन बाद 14 कि./हे. बोरेक्स अथवा 9 कि./हें. बोरिक एसिड पौधों के चारों ओर डालकर मिट्टी में अच्छी तरह मिला देना चाहिए। पर्णीय छिड़काव के लिए 0.2 प्रतिशत बोरेक्स के साथ 0.3 प्रतिशत बुझा चूना का 2-3 बार छिड़काव करें या 0.125 प्रतिशत बोरिक एसिड, 1.0 मि.ली. टीपाल एवं 12.0 ग्राम कैल्शियम क्लोराइड को प्रति लीटर पानी में घोल बनाकर 10-12 दिनों के अंतर पर 2-3 छिड़काव करें। जिंक (जस्ता) के कार्य व कमी के लक्षण एवं उपचार जिक (जस्ता) के कार्य व कमी के लक्षण जस्ता बहुत से पाचक रसों (एनजाइम्स) में सक्रिय कारक के रूप में भाग लेता है। बहुत से हार्मोन्स के निर्माण में इसकी भूमिका महत्वपूर्ण होती है। पौधों के प्रजनन में इसकी भूमिका बड़े महत्व की होती है। जस्ता की कमी से तने की लम्बाई में कमी (गाँठो के मध्य भाग का छोटा होना) आ जाती है। बालियाँ देर से निकलती है और फसल पकने में विलम्ब होता है। तने की लम्बाई घट जाती है और पत्तियाँ मुड़ जाती है। मकई में सफेद कली (चित्ती) रोग हो जाती है। अंकुरण के बाद पुरानी पत्तियाँ सफेद रंग धारण कर लेती है। धान में जिंक की कमी से पत्तों पर लाल भूरे रंग के धब्बे आ जाते है तथा पौधों का बढ़ाव रुक जाता है। “खैरा” नामक रोग जिंक की कमी से ही धान पर होता है। जिंक (जस्ता) उपचार जिंक की कमी के निदान के लिए बुआई से पहले जिंक सल्फेट 25 कि./हें. उर्वरक का प्रयोग अथवा इसके 1.0 प्रतिशत घोल जिसमें 0.25 प्रतिशत चूना मिला हो का छिड़काव करना चाहिए। स्त्रोत: कृषि विभाग, झारखण्ड सरकार